'भारतीय भाषाओं का साहित्य और सामासिक संस्कृति की विरासत' विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय ई-संगोष्ठी का आयोजन

दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय,गया, बिहार के हिन्दी विभाग द्वारा 'भारतीय भाषाओं का साहित्य और सामासिक संस्कृति की विरासत' विषय पर 03 एवं 04 सितम्बर, 2020 ई. को दो दिवसीय राष्ट्रीय ई-संगोष्ठी  का आयोजन हुआ। आयोजन के मुख्य संरक्षक: प्रोफेसर  हरिश्चंद्र सिंह राठौर, माननीय कुलपति दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया (बिहार), संरक्षक: प्रोफेसर प्रभात कुमार सिंह (अधिष्ठाता, भाषा एवं साहित्य पीठ, दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया, बिहार) संयोजक: प्रोफेसर सुरेश चन्द्र, अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया, सह संयोजक: डॉ तरुण कुमार त्यागी (सहायक प्राध्यापक, शिक्षक शिक्षा विभाग, दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया) और सचिव डॉ. रामचन्द्र रजक (सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया) रहें हैं।

ई-संगोष्ठी का उद्घाटन माननीय कुलपति प्रोफेसर  हरिश्चंद्र सिंह राठौर ने किया। उद्घाटन उद्बोधन में उन्होंने कहा कि अनेकता में एकता हमारी शक्ति है, जो किसी भी दूसरे राष्ट्र के पास नहीं है। यह अक्षुण्य है। यही हमारी विविधता को एक माला में गूँथती है। यह एक ऐसा आभूषण है, जिस पर सभी भारतीयों को गर्व होता है। सांस्कृतिक विरासत भाषा के माध्यम से आयी। प्रत्येक भाषा के साहित्य का न केवल हम रसास्वादन करतें है, बल्कि हम अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित भी होते हैं। नयी शिक्षा नीति में क्षेत्रीय भाषाओं के शामिल किये जाने की उन्होंने सराहना की। उन्होंने कहा कि यह विविधता में एकता की एक और मजबूत पहल है। संगोष्ठी के  विषय की सराहना करते हुए माननीय कुलपति ने  कहा कि ऐसी संगोष्ठियों का आयोजन सतत होना चाहिए। उन्होंने कहा कि इसका विस्तार विदेशी विद्वानों तक किया जाये।

परिचय सह स्वागत वक्तव्य में वेबिनार के  संयोजक व हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर सुरेश चन्द्र ने कहा कि सामासिक संस्कृति समाज, राष्ट्र, और विश्व में मानव सभ्यता के सम्यक् विकास की अनिवार्य शर्त है। जब एकाधिक समाजों की भिन्न-भिन्न क्रियात्मक अन्तस्चेतनाएँ भेदशून्य होकर मानवता सम्वर्द्धन हेतु एकमेव हो जाती हैं तब सामासिक संस्कृति का निर्माण होता है। इस स्थिति में मनुष्य मनुष्य के मध्य अपनत्व का बोध उत्पन्न, विकसित और पुष्ट होता है। भारत में सामासिक संस्कृति की जड़ें बहुत प्राचीन और गहरी हैं। बसुधैवकुटुम्बकम् की भारतीय अवधारणा इसका साक्षात् प्रमाण है। सामासिक संस्कृति की निर्मिति में भाषाओं और भाषाओं में रचित साहित्य की ऐतिहासिक भूमिका रहती है। प्रोफेसर चन्द्र ने अपने कथन की पुष्टि अमीर खुसरो के भाषा विषयक सामासिक दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए उनके काव्य काव्य से सन्दर्भ देकर की। प्रोफेसर चन्द्र ने अपने वक्तव्य में भारत के संविधान की उद्देशिका का सन्दर्भ देकर आगे कहा कि डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने भारत राष्ट्र के सम्यक् विकास के महान उद्देश्य से सामासिक संस्कृति को वैधानिकती प्रदान की। विश्वगुरु बनने के लिये यह आवश्यक है कि भारत के नागरिक अपनी सामासिक संस्कृति को निरन्तर समृद्ध करें। यह वेबिनार इस आवश्यकता के तहत ही आयोजित की जा रही है।

 उद्घाटन सत्र  की अध्यक्षता प्रोफेसर एल. नरेश वैद, पूर्व कुलपति, गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद, गुजरात ने की।  प्रोफेसर टी. वी. कट्टीमनि, कुलपति, सेंट्रल ट्राईवल  यूनिवर्सिटी ऑफ आंध्र प्रदेश, कोन्डाकरकम, विजयनगरम, आंध्र प्रदेश उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथ रहे।

अपने बीज वक्तव्य में प्रोफेसर टी. वी. कट्टीमनि ने कहा कि हिन्दी में वह शक्ति है जो भारत को जोड़ सकती है और विकास के मार्ग पर आगे बढ़ा सकती है। हिन्दी की सेवा ने मुझे दो बार कुलपति बनाया। उन्होंने कहा कि कन्नड़ भाषा के साहित्य में रामायण और महाभरत की कथाओं ने सामासिक संस्कृति की विरासत को आगे बढ़ाया है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की विभिन्न भाषाओं में लिखे गये प्रचुर साहित्य के माध्यम से सामासिक संस्कृति की विरासत निरन्तर सुदृढ़ हो रही है।

 अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रोफेसर एल. नरेश वैद ने कहा कि भूमण्डलीकरण के इस दौर में भारतीय साहित्य की अवधारणा का निर्धारण करना गलत है। भारतीय नाम की कोई भाषा नहीं, सभी रचनाओं में समान विशेषताओं के आधार पर भारतीय साहित्य की संकल्पना बनाना चाहिए। भारत एक भावधारा है, त्याग, संयम, करुणा, दया, विश्वास आदि सभी धर्म, जाति, समुदाय,कौम की सांस्कृतिक जीवन में मिलता है। पी. एन. जार्ज के कथन का हवाला देते हुए कहा कि भारतीय साहित्य गुलाब के पौधे के समान है, सभी भारतीय भाषाओं में रचा गया साहित्य इसकी टहनियाँ हैं। भारतीय साहित्य को राजनीतिक नजरिये के बजाय ज्ञान मीमांसा के आधार पर देखना चाहिए।

 अकादमिक सत्र-1 के स्रोत वक्ताओं में  डॉ. एस. लनचेनबा मीतै, एसोशिएट प्रोफेसर, डी. एम. कॉलिज ऑफ आर्ट्स, धनमंजुरी विश्वविद्यालय, इम्फाल, मणिपुर, डॉ. अच्युत शर्मा, पूर्व एसोशिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, गौहाटी विश्वविद्यालय, गुहाटी, असम, प्रोफेसर सगीर अफराहीम, पूर्व अध्यक्ष, उर्दू विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश  ने अपने अपने वक्तव्य दिये।

डॉ. एस. लनचेनबा मीतै ने अपने वक्तव्य में कहा कि सामासिक संस्कृति की विरासत केवल एक भाषा से नहीं बनती है। मणिपुर राज्य में आपसी एवं आन्तरिक संघर्ष देखने को मिलते हैं। मणिपुर राज्य में शान्ति स्थापित करने के लिये मणिपुरी भाषा के  साहित्य में साहित्यकारों ने सामासिक संस्कृति को स्वर दिया है और यह उपक्रम जारी है।

डॉ. अच्युत शर्मा ने कहा कि असमिया भाषा और उसका साहित्य  विविधता और बहुलता में एकता के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। इसमें मिली जुली संस्कृति का प्रतिफलन देखा जाता है। डॉ. शर्मा ने आगे कहा कि डॉ. बीरेन्द्र कुमार भट्टाचार्य, डॉ. इन्दिरा गोस्वामी, डॉ. भूपेन हजारिका आदि असमिया भाषा के साहित्यकरों ने भारत की सामासिक संस्कृति को समृद्ध किया है।

प्रोफेसर सगीर अफराहीम ने उर्दू साहित्य में राष्ट्रीय एकता और इंसान दोस्ती विषय पर वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि साहित्य का काम है कि वह लोगों के दिलों को जोड़े। प्रोफेसर अफराहीम ने अपने वक्तव्य में सवाल उठाते हुए कहा कि जब ये मीठी प्यारी ज़ुबान इंसानियत की धरोहर रही हैं तो आज परस्पर मनमुटाव क्यों है? उन्होंने यह भी कहा कि प्यार और मोहब्बत के गहरे मरहम से दिलों को जोड़ा जा सकता है। उन्होंने कहा कि अमीर खुसरो द्वारा रचित छाप तिलक सब छीने तुमसे नजरें मिला के मिली जुली तहज़ीब, गंगा जमुनी तहजीब का खुद-ब-खुद उदाहरण हैं। सामासिक संस्कृति इंसान दोस्ती को गुलजार बनाती है। चाहे गीता बांचिये या पढ़िए कुरान, मेरा तेरा प्यार ही हर पुस्तक का ज्ञान।और हर सू जब कुहराम मचा है, तुम फूलों की बात करो। जैसी उक्तिओं के हवाले से प्रोफेपर अफराहीम ने भारतीय भाषाओं के साहित्य में शब्दबद्ध  सामासिक संस्कृति की विरासत पर प्रकाश डाला। उन्होंने विस्तार से स्पष्ट किया कि उर्दू भाषा का

स्वरूप सामासिक है, क्योंकि इस भाषा की शब्दावली में अन्य अनेक भाषाओं के शब्द अपनत्व के साथ मिले हुए हैं।

 

संचालन का दायित्व ई-संगोष्ठी के संयोजक प्रोफेसर सुरेश चन्द्र ने पूरा किया। कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन ई-संगोष्ठी के सह-संयोजक डॉ. तरुण कुमार त्यागी ने किया।

अकादमिक सत्र-2 के स्रोत वक्ताओं में प्रोफेसर सदानंद काशीनाथ भोसले, अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, सावित्री बाई फुले, पुणे विश्वविद्यालय, पुणे, महाराष्ट्र, प्रोफेसर मेराज अहमद, हिन्दी विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़, उत्तर प्रदेशडॉ. सी. जे.  प्रसन्न कुमारी, पूर्व अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, राजकीय महिला महाविद्यालय, तिरुवनन्तपुरम, केरल और प्रोफेसर देबाशीष भट्टाचार्य, बांग्ला विभाग, असम विश्वविद्यालय, सिलचर, असम रहे।

प्रोफेसर भोसले ने अपने वक्तव्य में कहा कि हमारे देश की कोई भाषा भारतीय संस्कृति से अपने को भिन्न नहीं कर पाती है। इसी तरह की विरासत भारतीय भाषाओं को प्राप्त है। भारत जैसे बहुभाषिक, बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक समाज में मराठी साहित्य ने न केवल मराठी समाज को साहित्यिक, सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन मूल्यों से संस्कारित किया, बहुत हद तक समृद्ध भी किया है। मराठी साहित्य ने समता का सन्देश, मानव धर्म, प्रगतिशील सोच, सहजीवन के मूल्य, सांस्कृतिक जीवन के मूल्य, व्यापक जीवन की परिभाषा, सभी जीव और मनुष्य के प्रति प्रेम, समन्वय की भावना आदि के द्वारा भारतीय समाज , भारतीय साहित्य और भारतीय संस्कृति को समृद्ध  किया है। 

प्रोफेसर मेराज अहमद ने अपने उद्बोधन में  कहा कि अलगाववादी मानसिकता बहुत भयावह होती है। यह  राष्ट्र और समाज को उदासीन बनाती है। वह सांस्कृतिक जीवन को अवरुद्ध  करने पर अमादा रहती है।  अलगाववादी गुत्थियों को सुलझाने के लिए प्रत्येक भारतीय  भाषा में साहित्य रचा गया है। साहित्यकारों ने विखंडनकारी तत्वों की सम्पूर्ण मानसिकता को अपने लेखन से उदघाटित किया है। साहित्य में मानवीय करुणा, दया, प्रेम, भाईचार, सांस्कृतिक एकता के स्वर, आत्मीय सम्बन्धों  की विविध छवियाँ उदघाटित हुई हैं। विभाजन के दौरान उत्तपन्न पीड़ा, दंश, विभीषिका को खत्म करने का आधार हमारी सामासिक संस्कृति रही है। यही हमारी ताकत भी है। सामासिक संस्कृति अलगाववादी ताकतों को घुटने टेकने के लिए विवश करने के लिये काफी है।

डॉ. प्रसन्न कुमारी ने मलयालम भाषा में लिखे गये साहित्य में विन्यस्त सामासिक संस्कृति की विरासत  को स्पष्ट किया। उन्होंने यह भी कहा कि एक छोटा-सा प्रदेश होते हुए भी  केरल ने भारतीय सामासिक संस्कृति को सहेजने के साथ साथ संस्कारित एवं समृद्ध भी किया है।

प्रोफेसर देबाशीष भट्टाचार्य  ने अपने उद्बोधन में भारत में सांस्कृतिक अंतर संघर्ष की पहचान करायी। उन्होंने यह भी कहा कि जब तक हाशिये के समाज की सहभागिता नहीं होगी, समाज में  सामासिक संस्कृति का निर्माण नहीं हो सकता है और  न ही कोई राष्ट्र अपनी प्रगति कर सकता है।

संगोष्ठी के समापन सत्र की अध्यक्षता डॉ. ख़्वाजा इफ्तिखार अहमद, वरिष्ठ लेखक, चिंतक एवं संस्थापक अध्यक्ष, भारतीय अंतर्धम सौहार्द फाउंडेशन, नयी दिल्ली ने की। मुख्य अतिथि श्री श्रीप्रकाश मिश्र, वरिष्ठ साहित्यकार, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश समापन सत्र के मुख्य अतिथि रहे।

श्रीप्रकाश मिश्र  ने कहा कि मुख्य रूप से सामासिक संस्कृति के दो चित्र हैं। पहला अकबर द्वारा निर्मित है और दूसरा लोक में विकसित हुआ है। आजादी के बाद तर्क-वितर्क की स्थिति सुदृढ़ हुई। दलितवाद, स्त्रीवाद, आदिवासीवाद, थर्डजेंडरवाद आदि वाद उभरे। एक आलोचक राष्ट्र का निर्माण हुआ।  समस्त भारतीय कविता इस आलोचक राष्ट्र को कंकरीट रूप देना चाहती है।  समस्त कविताएं इसी पर केंद्रित हैं।

डॉ. ख़्वाजा इफ्तिखार अहमद ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि स्वीकार्यता, सहभागिता, सहकारिता, सहनशीलता, वैचारिक भावनात्मक अतिवाद से मुक्ति आदि से ही सामासिक संस्कृति का निर्माण किया जा सकता है। सामूहिकता, सरसता और भाईचारे की भावना आज भी है, कल भी थी और आने वाले समय में भी रहेगी। आज के वक्त में जरूरत है इंसान बनने की और इंसानियत की। इससे ही भारत को विश्व में गौरव और सम्मान मिलेगा। ऐसा करके ही हम भारत को विश्व गुरु बना सकते हैं। उन्होंने आगे कहा कि सामासिक संस्कृति के ताने-बाने के साथ साहित्य सभ्य समाज का आधार प्रदान करता है। भारतीय भाषाओं का साहित्य यह बहुत बेहतर ढंग से करता रहा है और कर रहा है।

सत्रों का संचालन संगोष्ठी संयोजक प्रोफेसर सुरेश चन्द्र ने किया। धन्यवाद ज्ञापन की औपचारिकता डॉ. तरुण कुमार त्यागी ने की।

इस ई-संगोष्ठी की खास बात यह रही कि सभी वक्ताओं ने एक स्वर में इसके विषय भारतीय भाषाओं का साहित्य और सामासिक संस्कृति की विरासतकी भूरि-भूरि प्रशंसा और बार-बार सराहना की। स्रोत वक्ताओं ने आयोजक मण्डल से आग्रह भी किया कि इस विषय पर निरन्तर संगोष्ठी का आयोजन होना चाहिए। यह राष्ट्र हित में है।

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