Lecture by CUSB Vice-Chancellor Prof. H.C.S. Rathore

on

"Historical Method of Research: Finding Research Questions, Analysis and Output"

 

Archaeology or archaeological reference is an important tool to establish any sort of History especially the findings dating back to thousand and thousand years back. In fact, after any type of ancient finding Historians and the researchers on History usually consult archaeologist to declare the finding as a part of History in public or publishing the same in books. Without establishing the truth associated with the findings and archaeological references, it is wrong or almost impractical to declare the History. This pattern is followed by the researchers worldwide since ages and in this way History is written or declared. People who are working in the field of Historical Research should must ensure and cross-check the varied aspects before making the result (findings) public, said CUSB Vice-Chancellor Prof. Harish Chandra Singh Rathore during his special lecture delivered at the University premises on 17th January, 2019.

 

 

Prof. Rathore had given the lecture on the topic entitled "Historical Method of Research: Finding Research Questions, Analysis and Output" organized by Department of History & Archaeology of the University. The Vice-Chancellor who himself is a veteran in Education field and sound academician shared many aspects related to Historical research with the students, researchers and faculty members present in the conference room. On this occasion Dr. Sudhanshu Kumar Jha, Head (I/C), Department of History also shared his views on the topic along with Prof. S. N. Singh, Dean, School of Social Sciences and Policy. The event was compared by M.A. History student Aastha Priya, while the vote of thanks was given by Dr. Niraj.  

 

 

ऐतिहासिक शोध में पुरातत्त्व बहुमूल्य ! प्रोफेसर राठौर

 

ऐतिहासिक शोध और शोध पर आधारित इतिहास को एक तथ्यात्मक बनाने में पुरातत्त्व का अहम योगदान होता है ! आसान शब्दों में कहें तो कोई भी खोज को ऐतिहासिक या इतिहास नहीं घोषित किया जा सकता है तब तक उसकी पुष्टि पुरातत्त्व से जुड़े विभिन्न आयामों का शोध और खोजबीन न की जाए ! विश्वभर में सदियों से इतिहासकार एवं इतिहास के शोधार्थी इसी सवरूप का अनुसरन करते हुए पुराने धरोहरों एवं सभ्यता की खोजबीन कर उसे उचित नामकरण देते हैं ! कही - सुनी बातों और आधे- अधूरे तथ्यों के आधार पर ऐतिहासिक शोध करना या किसी नतीजे तक पहुँचना या इसकी घोषणा करना पूरी तरह अनुचित है और न ही इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी तरह की मान्यता प्राप्त होती है ! हम यह कह सकते हैं कि इतिहास तथा पुरातत्त्व का परस्पर संबंध है और ये ऐतिहासिक शोध में काफी महत्व है ! ये बातें दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी) के माननीय कुलपति प्रोफेसर हरिश्चंद्र सिंह राठौर ने विवि के इतिहास एवं पुरातत्व (हिस्ट्री एंड आर्कियोलॉजी) विभाग द्वारा " हिस्टॉरिकल मेथड ऑफ रिसर्च : फाइंडिंग रिसर्च कोस्चन्स, एनालिसिस एन्ड आउटपुट" विषय पर 17 जनवरी 2019 को आयोजित व्याख्यान में दी ! इस विषय पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो हरिश्चन्द्र सिंह राठौर ने शोध छात्रों को संबोधित करते हुए शोध के मूलभूत सिद्धान्त और इतिहास में शोध विधि की जानकारी दी। 2 घंटे लंबे अपने व्यख्यान में कुलपति एक प्रसाशक होने के बजाये एक शिक्षक नजर आये और छात्रों के कौतूहल को अपने प्रबोधन के दौरान कई आम जीवन से सम्बंधित उदहारण  के जरिये संबोथित किया। छात्रों ने मंत्रमुग्ध होकर अपने कुलपति के अंदर के शिक्षक होकर सुना और कई प्रश्न पूछ कर शोध के तकनीक और स्रोत विषय पर अपने ज्ञान को बढ़ाया।कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रो हरिश्चन्द्र सिंह राठौर ने कहा कि "इतिहास विज्ञान है"। इतिहास वह है जो हमारे पूर्वज छोड़ गए हैं अर्थात इतिहास का प्रमाण है। शोध कार्य में शोध के उद्देश्य,उपकल्पना निर्माण, वास्तविक प्राथमिक डाटा ,माध्यमिक डाटा की समझ बहुत ही महत्वपूर्ण होती है। 

 

प्रोफसर राठौर ने सभागार में मौजूद शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों को ऐतिहासिक शोध से जुड़े अहम बिंदुओं को काफी सरल अंदाज़ में समझाया ! कुलपति ने ज़ोर देकर कहा कि बिना तथ्यों को सुनिश्चित किए किसी भी ऐतिहासिक खोज (अनुसंधान) को सार्वजनिक करने के दुष्परिणाम भी हो सकते हैं ! उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक शोध से मिले परिणाम (खोज) को सार्वजनिक करने से पहले उससे जुड़े पहलुओं की सघनता से जाँच / खोजबीन कर लेनी चाहिए ! इस अवसर पर माननीय कुलपति के साथ इतिहास एवं पुरातत्व के हेड (इंचार्ज) डॉ० सुधांशु कुमार झा, स्कूल ऑफ सोशल साइंस के डीन प्रोफेसर एस० एन० सिंह के साथ बड़ी संख्या में प्राध्यापकगण एवं विद्यार्थीगण मौजूद थे ! कार्यक्रम के प्रारंभ में दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का विधिवत उदघाटन विवि के कुलपति प्रो हरीशचंद्र सिंह राठौर , सामाजिक विज्ञान के अधिष्ठाता प्रो एस एन सिंह और इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ सुधांशु झा ने किया। कार्यक्रम को सामाजिक विज्ञान विभाग के अधिष्ठाता प्रो एस एन सिंह ने भी संबोधित किया। कार्यक्रम का मंच संचालन छात्रा आस्था प्रिया एवम धन्यवाद ज्ञापन डॉ नीरज ने किया। सभागार में विवि के विभिन्न विभागों से मौजूद शोद्यार्थियों / विद्यार्थियों ने माननीय कुलपति के अध्यक्षीय भाषण (व्याख्यान) को काफी उपयोगी बताया और कहा कि इन बातों का उपयोग शोध के अन्य छेत्रों में काफी बहुमूल्य हैं !   

 

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