'राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ई. के संदर्भ में भारतीय भाषा एवं साहित्य' पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया( सीयूएसबी) के हिंदी विभाग के तत्त्वाधान में दिनांक :17-18/08/2021 द्वि- दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया |संगोष्ठी का विषय था 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ई. के संदर्भ में भारतीय भाषा एवं साहित्य'। कार्यक्रम की शुरुआत उद्घाटन सत्र एवं अकादमिक सत्र से हुई । द्वि- दिवसीयसंगोष्ठी के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता माननीय कुलपति महोदय (दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया, बिहार) प्रोफेसर कामेश्वर नाथ सिंह के द्वारा की गई। इस सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे वरिष्ठ साहित्यकार एवं सेवानिवृत्त आईजीपी, राजस्थान श्रीयुत् हरिराम मीणा।

 

उद्धघाटन सत्र की शुरुआत, प्रोफेसर सुरेश चंद्र जी (अध्यक्ष, हिन्दी विभाग एवं अधिष्ठाता, भाषा एवं साहित्य पीठ) ने  सभी अतिथियों का स्वागत व परिचय के साथ किया। इसके पश्चात् उन्होंने विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भाषा केवल विचार संप्रेषण का माध्यम ही नहीं बल्कि संस्कृति की संवाहिका होती है | उन्होंने यह भी बताया कि संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिये भाषाओँ के संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता हैI उन्होंने निम्न बिन्दुओं पर अपनी बात रखी-

प्रत्यक्ष और तात्कालिक आर्थिक लाभ की नीति से उपर उठकर भारत राष्ट्र की प्रत्येक भाषा को, भारत की सभ्यता और संस्कृति की सामासिकता के रक्षार्थ, संरक्षित और विकसित करने की नीति अपनाई जाय I

अंग्रेजी के महत्त्व को शून्य के स्थान पर लाकर भारत राष्ट्र के प्रत्येक भाषा को गुणवत्तापूर्ण अध्यन-अध्यापन, पाठ्य-सामग्री निर्माण और शोध के लिये व्यावहारिक स्तर पर महत्व दिया जाय I

भारत राष्ट्र के हाशिये पर धकेल दिए गये वंचित जनों के लिए भारत राष्ट्र की प्रत्येक भाषा को समान स्तर पर प्रतियोगी परीक्षाओं का माध्यम बनाया जायI क्षेत्रिय और लुप्तप्राय भारतीय भाषाओँ को स्थानीय नागरिकों के रोजगार और मनोरंजन से जोड़ा जाय I इसके लिए क्षेत्रिय भाषाओँ में पत्रकारिता और फिल्म-निर्माण को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए Iक्षेत्रीय और लुप्तप्राय भारतीय भाषाओँ के विकसित करने के लिए शब्दकोष-निर्माण और अनुवाद को प्रोत्साहन दिया जाय Iक्षेत्रीय और लुप्तप्राय भाषाओँ की पत्रिकाओं और संचार पत्रों को मुख्य धारा की भाषाओँ की पत्रिकाओं और समाचार पत्रों की तरह ही सरकारी सहयोग और महत्त्व दिया जाय I भाषाओं के बचाव की आवश्यकता है।

             माननीय कुलपति महोदय प्रोफ़ेसर कामेश्वर नाथ सिंह जी ने अपने विचार रखते हुए बताया कि भारत दुनिया का सबसे विलक्षण देश है | इसकी विविधता के विषय पर अपनी बात रखते हुए उन्होंने बताया कि प्रकृति ने भारत को बहुत अधिक दिया है | यह नीति और विश्वास का विषय है| समावेशी संस्कृति और शिक्षा के कारण जलवायु विविधता एवं विभिन्न भाषा, संस्कृति होने के वावजूद हम एक हैं | समावेशी संस्कृति से पूरे विश्व को सीखना चाहिए | हम एक साथ रह सकते हैं यह दुनिया के लिए एक सन्देश है | सामूहिकता के भाव से इंसानियत पर एक सकारात्मक सोच के साथ यह भाव बोध प्राप्त होगा | इससे हमारी भाषा कला और संकृति का संरक्षण भी होगा | क्षेत्रीय/स्थानीय भाषाओँ को चिन्हित कर मुख्यधारा में लाने के लिए उपक्रम किये जाने चाहिए | इससे समावेशी जीवन वृष्टि विकसित करने में सहयता मिलेगी | और अपनी विविधता के बावजूद भारत एक है। उपनिवेशवाद के कारण बहुत सी भाषाएं विलुप्त हो रहीं है जिन्हें संरक्षित करना हमारा दायित्व है। समय और स्थान की महत्ता को महत्व देते हुए उन्होंने अपने वक्तव्य को संपन्न किया। मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे श्रीयुत् हरिराम मीणा ने कहा कि ज्ञान परंपरा को नई शिक्षा नीति से जोड़ा जाये। उन्होंने आदिवासी ज्ञान  परंपरा , विलुप्त भाषा के संगठन, मातृभाषा को शिक्षण का आधार बनाना, खुशहाली और समझदारी को शिक्षा का उद्देश्य बताया। भाषा की दृष्टि से आंचलिकता, राष्ट्रीयता और वैश्विकता के मध्य सामंजस्य, निजीकरण के खतरे, शिक्षा व्यवस्था के केंद्रीयकरण का सवाल, दलित,  आदिवासी, अन्य पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यकों की शिक्षा का मसला, परंपरागत ज्ञान को पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने की चुनौतियाँ आदि बिंदुओ पर श्रीयुत हरिराम जी के संबोधन को दर्शकों ने खूब सराहा।

 

उद्घाटन सत्र का धन्यबाद ज्ञापन हिंदी विभाग के सह प्राध्यापक डा. रवींद्र कुमार पाठक के द्वारा किया गया। इस सत्र का संचालन विभाग के शोधार्थी नचिकेता वत्स ने किया।

 

अकादमिक सत्र की शुरुआत प्रो. कमलानंद झा, हिन्दी विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वक्तव्य द्वारा की गई। उन्होंने नई शिक्षा नीति 2020 ई. की चुनौतियों एवं दिशाओं पर अपनी बात बेबाक़ी से रखी। पांडुलिपियों के संरक्षण,  लुप्तप्राय भाषाओं के संग्रहण , भाषा एवं साहित्य में शोध की आवश्यकता पर अपनी बात करते हुए कमलानंद झा ने अपनी बात समाप्त की।

वक्ता के रूप में प्रो. सुधा चौधरी,  दर्शनशास्त्र विभाग,  मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर द्वारा  निजीकरण, बाज़ारवाद आदि समस्याओं पर प्रकाश डाला गया। आज के इस दो दिवसीय राष्ट्रीय ई-संगोष्ठी के अकादमिक सत्र की अध्यक्षता कर रहे वक्ता प्रो. दिलीप मेहरा,  हिन्दी विभाग,  सरदार पटेल विश्वविद्यालय, वल्लभ विद्यानगर, गुजरात ने नई शिक्षा नीति के इतिहास , भाषाओं के वर्चस्व,  भाषाओं की स्तिथि पर बात रखते हुए कहा कि गुजरात में हिन्दी भाषा को धीरे-धीरे हटा देने का प्रभाव अध्ययन-अध्यापन पर पड़ रहा है। अकादमिक सत्र का धन्यवाद ज्ञापन हिंदी विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. शान्ति भूषण द्वारा किया गया । सहायक प्राध्यापक योगेश प्रताप द्वारा प्रथम सत्र का संचालन किया गया। कार्यक्रम में सह- प्राध्यापक डॉ. रवीन्द्र कुमार पाठक,  डॉ. कर्मानंद आर्य, डॉ. अनुज लुगुन,  डॉ. रामचंद्र रजक,  डॉ. कफील अहमद नसीम, मेघा सिन्हा, रविन्द्र कुमार, प्रियंका, रामरतन, सीमा,  सोनाली, चाहत, रुद्र, आदि सैकड़ों लोग उपस्थित रहे।

दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय,  हिंदी विभाग के द्वारा आयोजित द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय ई-संगोष्ठी के दूसरे दिन दूसरा अकादमिक सत्र दोपहर बारह बजे से आरम्भ हुआ | इस सत्र की अध्यक्षता श्रीमती वंदना टेटे ( सुप्रसिद्ध लेखिका एवं संपादक अखड़ापत्रिका रांची झारखण्ड) ने किया | इस सत्र का सञ्चालन विभाग की शोधार्थी चाहत के द्वारा किया गया | धन्यवाद ज्ञापन डॉ. रामचंद्र रजक ने किया |

संगोष्ठी के दूसरे दिन अकादमिक सत्र में व्याख्यान देते हुए हिंदी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज उ.प्र. के प्रो. योगेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि शिक्षा नीति में निरंतर परिवर्तन होते रहे हैं, भाषा और सहित्य के दृष्टि से यह शिक्षा नीति अत्यंत महत्त्वपूर्ण है| उन्होने आगे कहा कि विकसित देशों में वहां की भाषा के अलावे अन्य को अतिरिक्त महत्त्व नहीं दिया जाता| शिक्षा का माध्यम वहीँ की भाषा है|  मातृभाषा में शिक्षा मिलने पर बच्चों का अकुंठित विकास होता है| अंत में उन्होंने कहा कि भाषा का सम्बन्ध अस्मिता से है|

वक्ता के रूप में हिंदी विभाग साहू शांति जैन कॉलेज, सासाराम, बिहार के प्रोफेसर डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह जी ने कहा कि हिंदी को शब्दकोष पर काम करने की जरूरत है | हिंदी को छुआछूत की बीमारी पकडे हुए हैं| यहाँ के विद्वतजनो को हिंदी के डिक्शनरी पर काम करने की जरुरत है| यहाँ की लोकभाषा की शब्द-सम्पदा को हिंदी में लाने की जरूरत है| जंग लगे औजारों से नए साहित्य की रचना नहीं हो सकती| हिंदी शब्दकोष को लिबरल होना होगा |

वक्ता के रूप में उर्दू विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर सागीर अफ्रहीम जी ने कहा परिवर्तन मूल में होना चाहिए|प्राथमिक शिक्षा अनिवार्यतः मात्रिभ्षा में दी जानी चाहिए| सर सैयद के जीवन का उल्लेख करते हुए उनके भाषा और शिक्षा की प्रासंगिकता पर जोर दिया | अपने संबोधन के क्रम में प्रो. सागीर ने भाषा को समृद्ध करने पर बल दिया |–

वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रकाश मिश्र जी ने कहा कि पहल करने की जरुरत है, नैतिक बोध और  हौसले  की जरुरत है,  साहित्य का अर्थ यथार्थ से होना चाहिए| यह समय विशेषज्ञता का है| राष्ट्रीय शिक्षा नीति इसे आगे बढाती है|

आकादमिक सत्र की अध्यक्षता कर रहीं लेखिका श्रीमती वंदना टेटे, जी ने अपने अध्यक्षीय उद्धबोधन में कहा कि ऐसा नही है की कोई नीति पहली बार हमारे सामने आई है| चार आयोग बने| और तीन नीतियां हमारे सामने आ चुकी  हैं  | हमें बार-बार नीतियों पर बात करनी चाहिए और उसमें जो सकरात्मक है उससे लागू  किया जाना चाहिए |लुप्तप्राय भाषाओँ के संरक्षण पर बात करते हुए श्रीमति वंदना टेटे ने कहा कि यह एक बड़ी समस्या है | भाषाई विविधताओं को आज के बच्चों को समझाना समय की जरुरत है |

कार्यक्रम के दौरान इस दो दिवसीय ई-संगोष्ठी के दो दिन के व्याख्यानों पर विशेष वार्तालाप हिंदी विभाग के अध्यक्ष एवं भाषा तथा साहित्य पीठ के अधिष्ठाता,  प्रो. सुत्रेश चन्द्र जी ने किया | दो दिनों में जो विचार इससंगोष्ठी में आये उस पर विभाग्ध्यक्ष महोदय ने संक्षेप में टिप्पणी की | इसके साथ ही प्रो. सुरेश चन्द्र ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से एक भारत, श्रेष्ठ भारत का सपना कैसे पूरा हो, इस पर भी बात की  |

इस अकादमिक सत्र का धन्यवाद ज्ञापन सह प्राध्यापक डॉ. रामचंद्र रजक के द्वारा संपन्न हुआ | उक्त अवसर पर डॉ. योगेश प्रताप शेखर, डॉ. रवींन्द्र कुमार पाठक, डॉ. कर्मानंद आर्य,  डॉ. कफील अहमद,  डॉ. शांति भूषण, डॉ. अभय लियोनार्ड एक्का  समेत दर्जनों शिक्षक एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे|   

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