सीयूएसबी में हिन्दी का वैश्विक परिदृश्यविषय पर एक दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय ई-संगोष्ठी


हिन्दी विभाग, दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी) के द्वारा  "हिन्दी का वैश्विक परिदृश्य" विषयक एक दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय ई-संगोष्ठी का आयोजन किया गया । ई-संगोष्ठी की शुरूआत इसके सह-संयोजक डॉ० रामचन्द्र रजक के दिशा-निर्देशन में उपस्थित तीन माननीय कुलपतियों को अंग वस्त्र, श्री फल और पुस्तक प्रदान कर की गई। आगे स्वागत वक्तव्य देते हुए सीयूएसबी के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. सुरेश चन्द्र ने एक ही ई-मंच पर तीन माननीय कुलपतियों की उपस्थिति को हिन्दी प्रेमियों का संगम बताया। उन्होंने प्रस्तावना के रूप में कहा कि हिन्दी की सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनैतिक महत्ता को देखते हुए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसकी भागीदारी दृढ़ गति से बढ़ रही है।


मुख्य अतिथि के रूप में मगध विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. राजेन्द्र प्रसाद ने कहा कि क्षेत्रीय बोलियों का हिन्दी के विकास में अतुलनीय योगदान रहा है। अपनी निजी यात्रा का अनुभव साझा करते हुए कहा कि फीजी, मॉरीशस, त्रिनिदाद, टोबैगो आदि जगहों पर भोजपुरी भाषी प्रवासी मजदूरों ने अपनी भाषा-संस्कृति को जीवंत रखा है। वे उन देशों में रामचरितमानस अपने साथ लेकर गए। इसे उन्होंने भाषा की 'शिव यात्रा' (शिव की तरह बहुआयामी व्यक्तित्व व व्यापकता लिए हुए) की संज्ञा दी।


दूसरे मुख्य अतिथि के रूप में नव नालंदा महाविहार, नालंदा के माननीय कुलपति प्रो. वैद्यनाथ लाभ ने कहा कि लोक भाषा के रूप में हिन्दी कृषकों, श्रमिकों, फिल्मी कलाकारों और व्यापारियों को सहज-सरल-सर्वग्राह्य लगती रही जिससे इसका विस्तार होता रहा है। किंतु, हीन भावना से संचालित होकर हिन्दी का विकास नहीं किया जा सकता बल्कि हिन्दी के प्रति आत्म-गौरव का भाव ही इसे वैश्विक प्रसार दिला सकता है।


उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे सीयूएसबी के माननीय कुलपति प्रो. कामेश्वरनाथ सिंह ने कहा कि भारतीय राज्यों का सीमांकन यदि नदियों, पर्वतों आदि भौगोलिक कारकों के आधार पर हुआ होता तो भारत में आज भाषाई सौहार्द ज्यादा मजबूत होता। आगे उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक भाषा अंग्रेजी के कारण भारत की लगभग 80% प्रतिभाएँ पिंजरे में कैद एवं कुंठित हैं। उन्होंने मौजूदा सरकार के गृह मंत्रालय के हिन्दी प्रयोग की सराहना तो की ही, वैश्विक मंचों पर भी हिन्दी प्रयोग के भारत सरकार के कदमों को उत्साहजनक एवं प्रेरणाप्रद बताया। माननीय कुलपति ने हिन्दी विभाग को विश्वविद्यालय परिसर के अहिन्दी भाषियों के लिए हिन्दी सिखाने के पाठ्यक्रम पर कार्य करने का संकल्प लेने का आह्वान किया। उन्होंने आशा व्यक्त की कि हिन्दी भाषियों की 'सर्वे भवन्तु सुखिन:' की भावना हिन्दी भाषा को अवश्य विश्व भाषा का दर्जा प्रदान करेगी।


अकादमिक सत्र के पहले वक्ता के रूप में आर्हुस विश्वविद्यालय, डेनमार्क के डॉ०विवेक कुमार शुक्ल ने कहा कि सन् 1985 ई. से ही डेनमार्क में सरकारी प्रयास से हिन्दी भाषा और संस्कृति के प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ता जा रहा है। दूसरे वक्ता के रूप में रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन, एनसीईआरटी, मैसूर के डॉ० सर्वेश मौर्य ने कहा कि दक्षिण भारत में साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संगठन निरंतर हिन्दी के प्रचार-प्रसार को महत्व दे रहे हैं। आमजनों के प्रेम और सत्ता केन्द्र के खींच-तान के बावजूद हिन्दी का प्रयोग दक्षिण भारत में बढ़ता ही जा रहा है। तीसरे वक्ता के रूप में ओस्लो, नार्वे से प्रकाशित द्वैमासिक हिन्दी पत्रिका 'स्पाइल-दर्पण' के संपादक श्री सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' ने कहा कि गैर-राजनीतिक और गैर-धार्मिक पत्रिका के रूप में प्रतिमान बनकर ही हिन्दी पत्रकारिता हिन्दी भाषा का संवर्द्धन कर सकती है जैसा कि नार्वे की पत्रकारिता कर रही है। उन्होंने आगे कहा कि नार्वे की शिक्षण-पद्धति विकेंद्रीकरण पर आधारित है जिससे यहाँ भाषा सीखने-सिखाने के कार्य की जिम्मेदारी सरकार के अलावा घरों पर भी है।


अकादमिक सत्र में अध्यक्षीय वक्तव्य के रूप में महात्मा गाँधी इंस्टीट्यूट, मॉरीशस के भोजपुरी विभागाध्यक्ष डॉ०गिरजानन्द सिंह बिशेसर (अरविंद) ने कहा कि मॉरीशस में हिन्दी पाठ्यक्रम में भोजपुरी रचनाएँ भी शामिल की गई हैं। मॉरीशस में हिन्दी की क्षेत्रीय बोलियों के प्रति आमजनों और सरकार के प्रेम को असाधारण बताते हुए हर्ष जताया। विश्व हिन्दी सचिवालय, मॉरीशस द्वारा आयोजित विश्व हिन्दी सम्मेलनों की भी सराहना की।


ई-संगोष्ठी के अवसर पर सीयूएसबी के कुलसचिव कर्नल राजीव सिंह ने समापन सत्र में आमंत्रित वक्ता के तौर कहा कि भारतीय सेना में भिन्न भाषाई प्रांतों के जवान व अधिकारी प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं किन्तु आपात स्थितियों में उन्हें निर्देश की मानक भाषा के रूप में हिन्दी ही स्वीकृत है।


ई-संगोष्ठी के अंत में हिन्दी विभाग के सहायक प्राध्यापक, डॉ० शान्ति भूषण ने सभी वक्ताओं को धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि आज का धन्यवाद ज्ञापन परंपरा निर्वाह न होकर समस्त वक्ताओं, ई-संगोष्ठी हेतु पंजीकृत लगभग 400 प्रतिभागियों एवं उपस्थित श्रोताओं के हिन्दी प्रेम का व्यक्तिगत अनुभूति-प्रतिबिम्बन है।


ई-संगोष्ठी के सत्रों का संचालन क्रमश: नचिकेता वत्स, पुष्पा कुमारी और चाहत अन्वी ने किया। इस अवसर पर ई-हाल में प्रोफेसर रिजवानुल हक, परीक्षा नियंत्रक श्रीमती रश्मि त्रिपाठी, कम्पयूटर अधिकारी श्री अशोक कुमार, श्री प्रशांत रमन, डॉ० राजेश रंजन, डॉ०विपिन कुमार सिंह, संकायगण, शोधार्थीगण, विद्यार्थीगण, अधिकारीगण एवं कर्मचारीगण मौजूद थे।

 

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